NEET UG MBBS फर्जी सर्टिफिकेट मामला, जांच के दायरे में 778 अभ्यर्थियों के दस्तावेज, इन्वेस्टिगेशन तय करेगी ‘भविष्य’

NEET UG MBBS फर्जी सर्टिफिकेट मामले में 778 कैंडिडेट्स के डॉक्यूमेंट्स की जांच की जाएगी. अंतिम रिपोर्ट तक कई मामले सामने आएंगे. रिपोर्ट-किरणकांत शर्मा

देहरादून: उत्तराखंड में चर्चाओं का केंद्र बने नीट यूजी प्रमाण पत्र मामले में अब नीट-यूजी काउंसलिंग के जरिए मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में दाखिला पाने वाले अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्रों की भी परीक्षा शुरू हो गई है. स्वतंत्रता सेनानी राज्य कोटे  के तहत एमबीबीएस और बीडीएस में प्रवेश पाने वाले 778 अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की जांच की जानी है. इनमें 568 अभ्यर्थी ऐसे हैं जिन्होंने आवंटित सीट पर प्रवेश ले लिया है, जबकि 210 अभ्यर्थियों ने फ्लोट विकल्प चुना है. यानी सीट मिलने के बावजूद इन अभ्यर्थियों ने अगले चरण में बेहतर सीट मिलने की संभावना खुली रखी है.

फर्जी और संदिग्ध प्रमाणपत्रों के जरिए मेडिकल दाखिले का मामला सामने आने के बाद सरकार और चिकित्सा शिक्षा तंत्र ने अब राज्य कोटे के तहत आरक्षण का लाभ लेने वाले अभ्यर्थियों के दस्तावेजों को दोबारा जांच की कसौटी पर रखने का फैसला किया है. जांच में स्थायी निवास के साथ-साथ एससी-एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित जैसी श्रेणियों से जुड़े प्रमाणपत्रों की वैधता भी परखी जाएगी. यानि आने वाले समय में इस मामले में और भी कुछ नया निकल सकता है.

मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विश्वविद्यालय की ओर से पहले और दूसरे चरण की काउंसलिंग में शामिल कुल 1112 अभ्यर्थियों का विवरण सामने आया है. इनमें राज्य कोटे के तहत आरक्षण और विशेष श्रेणी का लाभ लेने वाले 778 अभ्यर्थियों के मूल प्रमाणपत्रों को सत्यापन के लिए संबंधित जिलों में भेजा जा रहा है. राज्य कोटे से इतर ऑल इंडिया मैनेजमेंट कोटे से दाखिला लेने वाले अभ्यर्थियों को इस विशेष जांच से अलग रखा गया है, क्योंकि उनके दाखिले राज्य स्तरीय आरक्षण व्यवस्था के आधार पर नहीं हुए हैं. ऐसे में फिलहाल जांच का मुख्य फोकस उन 778 अभ्यर्थियों पर है, जिनके दाखिले में किसी न किसी आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ जुड़ा हुआ है.

सीट मिली लेकिन प्रमाणपत्र तय करेगा दाखिला: नीट-यूजी काउंसलिंग के बाद आमतौर पर सीट मिलने और दाखिला पूरा होने के साथ अभ्यर्थी राहत की सांस लेते हैं. लेकिन इस बार राज्य कोटे के इन दाखिलों में कहानी कुछ अलग है. दाखिला होने के बाद भी दस्तावेजों का सत्यापन निर्णायक भूमिका निभाएगा. अभ्यर्थियों ने काउसलिंग के दौरान जिन प्रमाणपत्रों के आधार पर आरक्षण या विशेष श्रेणी का लाभ लिया, अब उन्हीं प्रमाणपत्रों की मूल अभिलेखों से पड़ताल की जाएगी. स्थायी निवास प्रमाण पत्र से लेकर जाति, ईडब्ल्यूएस, ओबीसी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र तक संबंधित रिकॉर्ड से मिलाए जाएंगे. यदि किसी प्रमाणपत्र में तथ्य गलत पाए जाते हैं या अभ्यर्थी की पात्रता उसके दावे के अनुरूप नहीं मिलती है तो नियमानुसार दाखिले पर कार्रवाई की जा सकती है. यानी अब मेडिकल सीट हासिल करने की दौड़ सिर्फ नीट की मेरिट और काउंसलिंग तक सीमित नहीं रह गई है, दस्तावेजों की सत्यता भी दाखिले की अगली कसौटी बन गई है.

स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल ने साफ कहा कि, जिला प्रशासन के स्तर पर प्रमाणपत्रों की जांच होगी. जरूरत पड़ने पर संबंधित राजस्व रिकॉर्ड, आवेदन प्रक्रिया और प्रमाणपत्र जारी करने के आधार तक को खंगाला जा सकता है. इस जांच का मकसद केवल किसी एक श्रेणी के प्रमाणपत्रों की पड़ताल करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि राज्य कोटे में आरक्षण का लाभ उसी अभ्यर्थी को मिले जो निर्धारित नियमों और पात्रता को वास्तव में पूरा करता हो.

प्रमाणपत्र बने जांच की वजह: दरअसल, प्रमाणपत्रों की जांच अचानक शुरू नहीं हुई. एमबीबीएस दाखिले में कथित फर्जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र के इस्तेमाल का मामला सामने आने के बाद पूरी व्यवस्था की निगाह दस्तावेजों पर टिक गई है. शिकायतों में कुछ अभ्यर्थियों द्वारा सरकारी पोर्टल पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र बनवाने के लिए कूटरचित दस्तावेज इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया था. देहरादून में अलग-अलग थानों में मुकदमे दर्ज होने के बाद मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई.

जांच आगे बढ़ी तो संबंधित शिक्षण संस्थानों से रिकॉर्ड लिए गए और अभ्यर्थियों द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में दर्ज पतों की भी पड़ताल की गई. इसी जांच ने अब मेडिकल दाखिले से जुड़े दस्तावेजों की व्यापक पड़ताल की. एसआईटी की जांच में जहां फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए कथित तौर पर एमबीबीएस में प्रवेश दिलाने का मामला सामने आया, वहीं सरकार ने राज्य कोटे के तहत आरक्षण का लाभ लेने वाले सभी अभ्यर्थियों के दस्तावेजों की सत्यता परखने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. यही वजह है कि अब 778 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों का सत्यापन महज सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं माना जा रहा बल्कि, इसे मेडिकल दाखिला प्रक्रिया की पारदर्शिता से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

45 लाख रुपए में एमबीबीएस दाखिले का आरोप, दो गिरफ्तार: इस मामले में देहरादून पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है. पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों में रूपेश पंडित और अरविंद कुमार शामिल है. जांच में पुलिस का दावा है कि रूपेश पंडित पिछले करीब पांच सालों से एजुकेशन कंसल्टेंसी के काम से जुड़ा था और मेरठ में एक कंसल्टेंसी संचालित कर रहा था.

पुलिस के मुताबिक, इसी माध्यम से विभिन्न निजी विश्वविद्यालयों और विदेशों में अलग-अलग पाठ्यक्रमों में दाखिला दिलाने का काम किया जाता था. पुलिस के अनुसार, अरविंद कुमार अपनी बेटी के एमबीबीएस दाखिले के लिए रूपेश के संपर्क में आया था और इसके बाद दो अन्य परिचितों के बच्चों के लिए भी दाखिले की बात हुई. पुलिस का दावा है कि तीनों अभ्यर्थियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कोटे के माध्यम से एमबीबीएस में प्रवेश दिलाने के एवज में प्रत्येक दाखिले के लिए 45 लाख रुपए लेने की बात तय हुई थी और परिजनों से कथित तौर पर 20-20 लाख रुपए एडवांस लिए गए. इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र तैयार कराने और उनके आधार पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला दिलाने का आरोप है. फिलहाल पुलिस इस पूरे प्रकरण में अन्य लोगों की भूमिका और कथित दस्तावेजी नेटवर्क की भी जांच कर रही है.

सिर्फ प्रमाणपत्र बनाने वाला ही नहीं, जारी करने की प्रक्रिया की भी जांच: इस प्रकरण का सबसे अहम पहलू यह है कि जांच अब केवल उन अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है जिन्होंने कथित तौर पर प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया. सवाल यह भी है कि यदि कोई प्रमाणपत्र फर्जी था तो वह सरकारी प्रक्रिया तक पहुंचा कैसे? और उसे सत्यापन के बाद जारी किस स्तर से किया गया?

चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने भी जांच के दायरे में प्रमाणपत्र हासिल करने वाले व्यक्ति के साथ-साथ प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया को शामिल करने की बात कही है. उन्होंने जिलाधिकारी को जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे. इसी दिशा में एसआईटी राजस्व रिकॉर्ड संबंधित कार्यालयों और दस्तावेजों की प्रक्रिया को खंगाल रही है. जांच के दौरान संबंधित पटवारियों से पूछताछ और एसडीएम कार्यालय से रिकॉर्ड जुटाने की कार्रवाई भी सामने आई है. इससे संकेत साफ है कि पूरा मामला केवल फर्जी प्रमाणपत्र इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं रखा जा रहा बल्कि, यह भी देखा जा रहा है कि सरकारी सत्यापन व्यवस्था में कहीं कोई चूक, लापरवाही या जानबूझकर की गई गड़बड़ी तो नहीं हुई है. हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका अभी तक की जांच में संदिग्ध नहीं मिली है.

कितने प्रमाणपत्र सही, कितनों में गड़बड़ी: अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 778 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच में क्या सामने आता है. फिलहाल इन सभी अभ्यर्थियों को फर्जी दस्तावेज वाला मानना सही नहीं होगा. जांच का उद्देश्य ही यह पता लगाना है कि कौन से प्रमाणपत्र नियमों के अनुरूप है? और किन मामलों में दस्तावेज या पात्रता को लेकर वास्तविक विसंगति मौजूद है? इसी तरह सामने आई संदिग्ध अभ्यर्थियों की सूचियों को भी अंतिम दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता. अधिकारियों की जांच और मूल रिकॉर्ड के मिलान के बाद ही किसी प्रमाणपत्र की वास्तविक स्थिति तय होगी.

प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया भी होगी जांच: चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के निर्देश दिए हैं. उन्होंने कहा कि, जांच केवल प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करने वाले अभ्यर्थी तक सीमित नहीं रहेगी. बल्कि यह भी देखा जाएगा कि प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया में किस स्तर पर गड़बड़ी हुई? मंत्री ने जिलाधिकारी को जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं.

यदि किसी अभ्यर्थी ने फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर दाखिला लिया है और जांच में यह साबित होता है तो दाखिला निरस्त करने जैसी कार्रवाई की जा सकती है.
-सुबोध उनियाल, चिकित्सा शिक्षा मंत्री-

राज्य कोटे के 778 अभ्यर्थियों के मूल दस्तावेज सत्यापन के लिए भेजे: एचएनबी उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय की ओर से पहले और दूसरे चरण की काउंसलिंग में प्रोविजनल प्रवेश और फ्लोट विकल्प से जुड़े अभ्यर्थियों की सूची जारी की गई है. विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक प्रो. विजय जुयाल के मुताबिक,

सूची में शामिल 1112 अभ्यर्थियों में से 778 ने राज्य कोटे के तहत आरक्षण का लाभ लेते हुए एमबीबीएस-बीडीएस में प्रवेश लिया है. इन अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन जिला प्रशासन के स्तर पर कराया जा रहा है. यानी विश्वविद्यालय स्तर पर दाखिले की प्रक्रिया के बाद अब प्रमाणपत्रों की वास्तविकता का परीक्षण संबंधित प्रशासनिक अभिलेखों से किया जाएगा.
-प्रो. विजय जुयाल, परीक्षा नियंत्रक, एचएनबी उत्तराखंड चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय-

दो गिरफ्तार, कब्जे में दस्तावेज और शिक्षण संस्थानों के रिकॉर्ड: देहरादून एसएसपी के मुताबिक, रायपुर और थाना क्लेमेंटटाउन में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आश्रित प्रमाणपत्र बनवाने से संबंधित मामले दर्ज किए गए थे. इस मामले में एसआईटी गठित की गई थी.

जांच के दौरान संबंधित दस्तावेज कब्जे में लिए गए और शिक्षण संस्थानों से भी रिकॉर्ड जुटाए गए. पुलिस ने उपलब्ध साक्ष्यों और पूछताछ के आधार पर रूपेश पंडित और अरविंद कुमार को गिरफ्तार किया है. प्रकरण से जुड़े अन्य पहलुओं और संभावित अन्य आरोपियों की भूमिका की भी जांच जारी है. साक्ष्यों के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी.
-प्रमेंद्र डोबाल, एसएसपी देहरादून-