उत्तराखंड में धामी सरकार को फेल करने में जुटी अफसरशाही, आदेश के बाद भी पहाड़ चढ़ने को कतई तैयार नहीं हो रहे अधिकारी

उत्तराखंड कर्मचारी हलचल
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जनपक्ष टुडे ब्यूरो, पौड़ी गढ़वाल/देहरादून। कांग्रेस पार्टी लगातार यह आरोप लगाती रहती है कि प्रदेश की अफसरशाही बेलगाम हो गई है। सरकारी घोषणाएं कागजों में बाहर नहीं निकल पा रही है। सरकार के दावों के उलट धरातल पर प्रगति शून्य है। योजनाओं को समय पर अमलीजामा पहनाने में उत्तराखंड के ही अफसर पलीता लगाने में लगे हुए हैं।

प्रदेश में जहां एक ओर जल जीवन मिशन कार्यक्रम में योजना की गलत प्लानिंग के कारण सरकार की हर जगह किरकिरी हो रही है, वहीं पेयजल निगम के अफसर मुख्यमंत्री के आदेशों को धत्ता बताकर पहाड़ चढ़ने को राजी नहीं है। इससे कहीं न कहीं चुनावी साल में कांग्रेस को यह साबित करने का मौका मिल रहा है कि भाजपा सरकार शासन-प्रशासन और प्रबन्धन में पूरी तरह से फेल हो गई है।

पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और उनके बाद तीरथ सिंह रावत अफसरशाही की भेंट चढ़ चुके है। सत्ता संभालने के बाद युवा मुख्यमंत्री धामी ने जरूर नौकरशाही को कड़ा संदेश दिया है और आदेश दिया कि अधिकारी अपने मुख्यालय में ही रहें और सजग होकर योजनाओं को धरातल पर उतारें, लेकिन जल निगम के मुख्य अभियंता स्तर तके के अधिकारी बिना किसी से अवकाश स्वीकृत कराए अपने मुख्यालय से नदारद हैं।

पेयजल विभाग की बात करें तो यहां अधिकारी मनमौजी हो गए हैं। पेयजल निगम के मुख्य अभियंता गढ़वाल इंजीनियर के के रस्तोगी का स्थानांतरण 11 अगस्त 2021 को पौड़ी में हुआ था। उन पर मुख्य अभियंता मुख्यालय रहते हुए स्थानांतरण व पदोन्नति में गड़बड़ियों के गंभीर आरोप लगे हैं।

शिकायतें पेयजल मंत्री तक पहुंचने पर उनका स्थानांतरण पौड़ी किया गया, लेकिन उत्तराखंड के इतिहास में पहला मौका होगा जब मयख अभियन्ता गढ़वाल रस्तोगी ने देहरादून में बैठे-बैठे ही मुख्य अभियंता गढ़वाल की जॉइनिंग दे दी, जबकि मुख्य अभियंता गढ़वाल का मुख्यालय पौड़ी में है। यह ऑनलाइन जॉइनिंग का उत्तराखंड का अपना पहला मामला है।

हमारे पौड़ी संवाददाता ने खबर की पड़ताल के दौरान पाया कि मुख्य अभियंता महोदय आजादी के पर्व  15 अगस्त को भी झंडारोहण को पौड़ी नहीं पहुंचे। पौड़ी के स्थानीय नेताओं के द्वारा यह मुद्दा उठाए जाने और मीडिया में सरकार की किरकिरी होने पर 26 अगस्त 2021 को केके रस्तोगी ने स्थानांतरण आदेश के 15 दिन बाद पौड़ी में चरण रखे, लेकिन पौड़ी मुख्यालय को उनका सानिध्य केवल 3 दिन के लिए मिल पाया।

पड़ताल के दौरान यह बात भी सामने आई कि 29 अगस्त 2021 को बिना किसी उच्च स्तर से अनुमति लिए  मुख्य अभियंता पौड़ी से देहरादून को चल दिए। तब का दिन है और आज का दिन है पौड़ी में मुख्य अभियंता की कुर्सी मुख्य अभियंता की बाट जोह रही है।

यह बात सोचनीय है कि पिछले इतने दिन से मुख्य अभियंता गढ़वाल की अनुपस्थिति में पेयजल निगम के गढ़वाल क्षेत्र की क्या स्थिति हो रही होगी। यह स्थिति तब है जब पेयजल निगम पर केंद्र सरकार की अति महत्वकांक्षी जल जीवन मिशन जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम का जिम्मा है और बिना पेयजल के सूखे नल के कनेक्शन देने से जनता में पेयजल निगम की थू-थू हो रही है।

गौरतलब है कि दिल्ली से आई केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन की टीम ने राज्य के मुख्य सचिव और सचिव पेयजल को खरी-खोटी भी सुनाई थी और गढ़वाल में बदहाल पेयजल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। केंद्रीय टीम ने उत्तराखंड मे बदहाल जल जीवन कार्यक्रम का फीडबैक जल शक्ति मंत्रालय और पीएमओ को भी दिया था। उसके बाद भी पेयजल विभाग के अधिकारियों का इस तरह से बेपरवाह बने रहना धामी सरकार के इकबाल पर सवाल खड़े कर रहा है।

बताया जा रहा है कि मुख्य अभियंता पौड़ी केके रस्तोगी जल जीवन मिशन के बजाय खुद के प्रमोशन के मिशन में जुटे हुए हैं। चर्चा है वह आजकल पौड़ी मुख्यालय से नदारद रहकर खुद की नोशनल पदोन्नति के लिए सचिवालय में अनुभागों से लेकर बाबुओं के घरों के चक्कर काट रहे हैं। यह बात भी सामने आ रही है कि पेयजल निगम में स्थाई प्रबंध निदेशक न होना भी कहीं ना कहीं पेयजल निगम के उच्चाधिकारियों के निरंकुश होने का कारण बन रहा है।

पेयजल निगम के कर्मचारी संगठन यद्यपि इस मामले पर खुलकर कुछ नहीं बोल रहे हैं, लेकिन अंदरखाने इस विषय पर भारी आक्रोश है। जहां जल निगम के कर्मचारियों ने समय से वेतन न मिलने के कारण 28 अक्टूबर से हड़ताल का नोटिस दिया हुआ है, वहीं पेयजल निगम के अधिकारी अपना मुख्यालय छोड़कर सरकारी गाड़ियों में अपना निजी काम कर रहे हैं।

इस सम्बन्ध प्रबंध निदेशक से बात करने के लिए उनसे दूरभाष पर संपर्क किया गया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया। अब देखना यह होगा कि शासन ऐसे बेलगाम अधिकारियों पर कुछ कार्रवाई करता है या वर्तमान में राजनीतिक परिदृश्य में सक्रिय पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का यह कहना सही साबित होगा कि भाजपा के मुख्यमंत्रियों को उनसे ट्रेनिंग लेने की आवश्यकता है कि कैसे नौकरशाही को काबू में रखा जाए।

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