उत्तराखंड: जब शासन की हो जाए कृपा, तब हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी बन जाते हैं कूड़ा

उत्तराखंड कर्मचारी हलचल राजकाज
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– हाईकोर्ट ने जिस मामले को किया खारिज उस पर  सचिव पेयजल ने लगाई मुहर

जनपक्ष टुडे ब्यूरो, देहरादून। सही को गलत और गलत को किस तरह सही करना है यह तो कोई उत्तराखंड के नौकरशाहों से सीखें। नियम कानून को तो ये ठेंगे पर रखते ही हैं, कोर्ट के फैसलों की व्याख्या भी ये अपने मुताबिक ही करते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि जिन मामलों को कोर्ट खारिज कर देता है उस पर शासन में बैठे अफसर अपना फैसला भी दे रहे हैं। शासन मेहरबान हो जाए तो एक की जगह 2-3 प्रमोशन फोकट में मिल सकते हैं। तब हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के आदेश खिलाफ भी हो तो उसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। आपके ऊपर शासन की कृपा बरसती रहेगी।

जी हां, उत्तराखंड पेयजल निगम में एक ऐसा ही मामला सामने आया है। एक इंजीनियर पर शासन ऐसी कृपा बरसा  रहा है कि वह एक साथ 2-3 प्रमोशन पा गया। यही नहीं  शासन ने कृपा ऐसी बरसाई की इस इंजीनियर की नोशनल पदोन्नति की जिस अर्जी को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था उस पर शासन के अफसरों ने अपनी मुहर लगा दी।

इस मामले से जाहिर हो रहा है कि हाईकोर्ट के बाद अब कार्मिकों को शायद सुप्रीम कोर्ट जाने की बजाए शासन की कृपा की जरुरत है। हाईकोर्ट से यदि याचिका खारिज हो भी जाती है, तो वह सीधे उत्तराखंड शासन से अपने पक्ष में जजमेंट ले सकते हैं। बता दें कि उत्तराखंड के अलावा देश के अन्य राज्यों की नौकरशाहों को शायद ये कृपा बरसाने का सर्टिफिकेट नहीं है।

आइए, हम आपको पूरा मामला समझाते हैं। यह अजीबोगरीब मामला उत्तराखंड पेयजल निगम में इंजीनियरों की वरिष्ठता से जुड़ा है। राज्य में आईएएस किस तरह मनमाने तरीके से काम कर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं यह उसका जीता-जागता प्रमाण है। आरोप है कि पेयजल निगम में प्रभारी चीफ इंजीनियर केके रस्तोगी ने अपने से वरिष्ठ करीब 70 इंजीनियरों को जूनियर बताते हुए खुद को सीनियर घोषित करा दिया।

गौर करने वाला पहलू यह है कि केके रस्तोगी ने नोशनल पदोन्नति देने को लेकर शासन के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने इनकी याचिका को स्वीकार भी कर लिया। यह भी बता दें कि इंजीनियरों की वरिष्ठता के तीन कैडर हैं। मूल कैडर जेई का है। इसके बाद एएमआईई और सीधी भर्ती का है।

नियम ये है कि किसी भी चयन वर्ष में जो भी इंजीनियर प्रोन्नत होते हैं वही उसकी वरिष्ठता का आधार होता हैं। आरोप है कि नियमों की गलत व्याख्या करके केके रस्तोगी ने चीफ इंजीनियर मुख्यालय रहने के अपने कार्यकाल के दौरान वरिष्ठता सूची में कूटरचना के साथ नियमों की गलत व्याख्या करा कर शासन से वरिष्ठता सूची जारी कराई है।

हद तो तब हो गई कि जब शासन पूर्व में हाईकोर्ट के निर्देश पर बनाई गई फीडिंग कैडर की वरिष्ठता को ताक पर रख रस्तोगी को नोशनल पदोन्नति दे रहा है। जिसे पूरी तरह नियमों के विरुद्ध और वरिष्ठ अभियंताओं के मौलिक अधिकारों हनन बताया जा रहा है।

मामले में झोल यह है कि वरिष्ठता सूची में केके रस्तोगी का सीनियरिटी क्रमांक 1844 है वह 2002 में जेई से सहायक अभियंता के पद पर पदोन्नत हुए। जबकि उनसे पूर्व महेंद्र सिंह 1996 में एससी-एसटी कोटे से सहायक अभियंता के पद पर पदोन्नत हुए।

इनकी वरिष्ठता 2185 दर्शाई गई है। नियमतः महेंद्र सिंह रस्तोगी से वरिष्ठ हुए। मान लेते हैं कि 1844 क्रमांक सीनियरिटी में 2185 से पहले होने के कारण केके रस्तोगी वरिष्ठ हो गए, लेकिन ये बात किसी के गलते नहीं उतर पा रही है कि 575 से लेकर केके रस्तोगी की सीनियरिटी से पहले तक के क्रमांक वाले सभी इंजीनियर उनसे जूनियर कैसे हो गए। जबकि वरिष्ठता सूची में अंतिम नाम रोहिताश कुमार शर्मा का है, जो केके रस्तोगी से वरिष्ठ हैं।

केके रस्तोगी पर वरिष्ठता सूची में छेड़छाड़ के आरोप बेवजह नहीं लग रहे हैं। इसका एक और उदाहरण कान खड़े करने वाला है। इंजीनियर नरेश चंद्र जैन 2009 में जेई से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नत हुए तो इनका सीनियरिटी क्रमांक था 1284 और राजेश मोहन श्रीवास्तव भी 2009 में जेई से पदोन्नत होकर सहायक अभियंता बने तो इनका सीनियरिटी क्रमांक 1294 था। ये दोनों इंजीनियर सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं।

अब सवाल यह है कि जब 2009 में पदोन्नत इंजीनियर वरिष्ठता में केके रस्तोगी से सीनियर थे, तो उन्हें क्यों नहीं नोशनल पदोन्नति का लाभ दिया गया। इन्होंने निगम के लिए ऐसा क्या कार्य कर दिया कि सरकार को इन पर मेहरबानियां बरसाई जा रही है।

वरिष्ठता सूची को लेकर सुलगते सवाल

तमाम गड़बड़ियों और छेड़छाड़ के आरोपी से घिरी सहायक अभियंता सिविल की वरिष्ठता सूची में झोल ही झोल नजर आ रहा है। यह बात भी गौर करने वाली है कि 6 फरवरी 2021 शाम को आउट की गई। जबकि वरिष्ठता सूची पर निगम के प्रबंध निदेशक के हस्ताक्षर 1 जनवरी 2021 के हैं और 1 फरवरी 2021 को ही यह सूची मुख्यालय से डिस्पैच है, लेकिन हैरत की बात यह है कि वरिष्ठता सूची ई-मेल के माध्यम से डिवीजनों को भेजी गई। सवाल यह है कि 6 दिन तक वरिष्ठता सूची को क्यों और किसके आदेश से दबाकर रखा गया। इसको लेकर तमाम सवाल उठ रहे हैं।

आरटीआई में हुआ ये चौंकाने वाला खुलासा

तत्कालीन प्रभारी मुख्य अभियन्ता मुख्यालय केके रस्तोगी पर वरिष्ठता सूची में छेड़छाड़ एवं कूट रचना के आरोप बेवजह नहीं लग रहे हैं। आरटीआई में मांगी गई जानकारी में खुलासा हुआ है कि प्रधान कार्यालय के पत्र संख्या 51/ दिनांक 30 जनवरी 2021 द्वारा विभागीय अधिवक्ता नरेंद्र कुमार पन्त से सीनियरिटी मामले में विधिक परामर्श लिया गया है। जबकि उक्त पत्रावली में 25 और 29 जनवरी के हस्ताक्षर हैं। सवाल यह है कि जिस मामले में राय ही 30 जनवरी को ली गई उसकी पत्रावली एक हफ्ते पहले कैसे हस्ताक्षर होकर पास हो गई। भविष्य की कार्रवाई का पहले कैसे केके रस्तोगी को पता चल गया। यह यक्ष पश्न पेयजल निगम में चर्चा का विषय बना हुआ है।

मुख्य सचिव की गई मामले की शिकायत

प्रभारी मुख्य अभियंता केके रस्तोगी को नियमों के विपरीत दी जा रही नोशनल पदोन्नति देने का मामला मुख्य सचिव के पास पहुंच गया है। उत्तराखंड पेयजल पेंशनर्स एसोसिएशन ने मुख्य सचिव से मामले का संज्ञान लेकर त्वरित कार्रवाई की मांग की है।

एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष इंजीनियर प्रवीन सिंह रावत ने मुख्य सचिव एसएस संधू को दिए शिकायती पत्र में कहा है कि निगम प्रबंधन द्वारा सहायक अभियंता सविल की वरिष्ठता सूची जारी करते समय एएमआईई से पदोन्नत सहायक अभियंताओं को उच्च न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर दोहरी व्याख्या करते हुए गलत वरिष्ठता दी गई है।

सूची में जहां मूल कैडर की वरिष्ठता को आधार बनाते हुए वर्ष 1996 में पदोन्नत सहायक अभियंता को वर्ष 2000 में पदोन्नत अभियंता से नीचे वरिष्ठता दी गई। वहीं वर्ष 2000 में पदोन्नत अभियंताओं से मूल कैडर में वरिष्ठ अभियंताओं को भी उनसे निम्न वरिष्ठता दी गई है, जो सीधे उच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना है।

शिकायती पत्र में पीएस रावत ने कहा है कि तत्काली प्रभारी मुख्य अभियंता मुख्यालय केके रस्तोगी का मूल पद अधिशासी अभियंता था, जबकि उनसे सीनियर महेंद्र सिंह को प्रभार न देकर रस्तोगी को प्रभारी मुख्य अभियंता मुख्यालय का प्रभार सौंपा गया।

मुख्य अभियंता मुख्यालय रहते हुए रस्तोगी ने स्वयं गलत वरिष्ठता निर्धारित करते हुए अपने से वरिष्ठ अभियंताओं से उपर अपनी सीनियरिटी करा ली। इतना ही नहीं इनके द्वारा गलत तरीके से अधीक्षण अभियंता की पदोन्नति भी ले ली। अब अधीक्षण अभियंता के पद से नोशनल पदोन्नति के प्रयास भी इनके द्वारा किए जा रहे हैं।

प्रवीन सिंह रावत ने शिकायती पत्र में इस बात का भी जिक्र किया है कि केके रस्तोगी द्वारा नोशनल पदोन्नति के लिए नैनीताल हाईकोर्ट में जो रिट याचिका संख्या 425/2021 दायर की गई थी। वर्तमान में शासन से मिलीभगत करके उनके द्वारा दायर याचिका वापिस लेते हुए याचिका को लोक सेवा अधिकरण में दर्ज कराने का अनुरोध किया है, जिसके बाद हाईकोर्ट ने उक्त याचिका को खारिज करने के आदेश जारी कर दिए हैं।

ऐसे में जब हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में कोई आदेश निर्गत नहीं किए हैं और न ही टीब्यूनल ने ही कोई फैसला दिया है। ऐसे में उत्तराखंड शासन कैसे रस्तोगी को नोशनल पदोन्नति दे रहा है, यह आश्चर्यजनक ही नहीं, बल्कि घोर अपराध है। यह उत्तराखंड शासन की कार्यप्रणाली को भी संदेह के घेरे में लातील है। यही नहीं यदि रस्तोगी को नोशनल पदोन्नति दी जाती है, तो यह मौलिक रुप से वरिष्ठ अभियंताओं के नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध है और इससे उनके हित सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे हैं।

शिकायतकर्ता ने मुख्य सचिव से केके रस्तोगी को नियम विरुद्ध ढंग से दी जा रही नोशनल पदोन्नति की कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। अब देखना यह होगा कि मुख्य सचिव मामले का संज्ञान लेकर शिकायत की जांच कराते हैं या फिर इस प्रकरण का भी वही हश्र होगा, जैसे पूर्व में सचिव पेयजल द्वारा अन्य शिकायतों का किया गया है।

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