इंजीनियरों के प्रमोशन को लेकर पेयजल निगम का एक अजीबोगरीब आदेश बना है राज्य में चर्चा का केंद्र

उत्तराखंड कर्मचारी हलचल
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– अधीक्षण अभियंता (सिविल) के 10 रिक्त पदों पर प्रमोशन के आदेश से असमंजस में अभियंता, 3 प्रोन्नत अभियंताओं को शाखा कार्यालयों में कार्यभार ग्रहण करने के नियम विरुद्ध आदेश को लेकर शासन की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, निगम प्रबंधन भी अभियंताओं के निशाने पर

जनपक्ष टुडे ब्यूरो, देहरादून। उत्तराखंड पेयजल निगम में आजकल एक अजीबोगरीब आदेश खूब चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है। चर्चाएं हो भी तो क्यों नहीं। क्योंकि जो भी यह आदेश पढ़ रहा है उसका सिर चकरा रहा है। राज्य में प्रमोशन का अभी तक का शायद यह पहला ऐसा आदेश होगा, जिसको समझने में हर किसी को दिमाग की चाबी घुमानी पड़ रही है। बताया जा रहा है कि डिवीजन में सर्किल स्तर के अधिकारी को कार्यभार ग्रहण कराने के इस मामले को लेकर सचिवालय से लेकर पूरे प्रदेश में अध्ययन शुरू हो गया है। राज्य में यह स्थिति तब है जब पेयजल विभाग जिम्मा खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी संभाल रहे हैं। दूसरे विभागों की स्थिति क्या होगी इससे सदज ही समझा जा सकता है।

प्रमोशन आदेश को पढ़कर निगम के अधिकारी-कर्मचारी अपनी अलग-अलग राय रख रहे हैं। कोई कह रहा है कि यह आदेश अजानकार और भांग के नशे में टाइप किया गया लगता है। शासन में बैठे अफसर कितनी गम्भीरता से कार्य करते हैं वह इस प्रकरण से साफ झलकता है। अब जब मामले में किरकिरी हो रही है, तो अफसर जल्द नया आदेश जारी करने की बात कह रहे हैं।

आइए, पूरा मामला आपको समझाते हैं। यह प्रकरण उत्तराखंड पेयजल निगम से जुड़ा है। करीब एक साल से निगम में अधीक्षण अभियंताओं के रिक्त पदों पर डीपीसी लटकी हुई थी। विधानसभा चुनाव आचार संहिता समाप्त होने के बाद 12 मार्च को अधीक्षण अभियंता (सिविल) के रिक्त 10 पदो के लिए डीपीसी की गई। लगभग एक माह तक डीपीसी को दबाकर रखा गया। इसके पीछे का मंतव्य आज तक किसी को पता नहीं है। जबकि इससे पूर्व कराई गई कई डीपीसियों के आदेश उसी दिन या फिर अगले दिन जारी हुए हैं। इस मामले में ऐसा क्या पेच था, जिसे लेकर शासन और निगम अफसर को आदेश जारी करने में एक माह वक्त लग गया।

खैर गत सोमवार 4 अप्रैल को किसी तरह प्रमोषन आदेष जारी हुए। इसमें 10 अधिषासी अभियंताओं को अधीक्षण अभियंता पद के 37400-67000 ग्रेड वेतन 8700 लेवल-13 के वेतनमान 123100-215900 में पदोन्नतियां दी गई, जिसमें सुजीत कुमार विकास, दीपक मलिक, संजय सिंह, कपिल सिंह, आलोक कुमार, सीता राम, रकमपाल, अनूप पांडे, यूके गुप्ता और दिनेश बंसल शामिल है।

प्रमोशन आदेश में हैरानी की बात यह है कि नए पदोन्नत 7 अधीक्षण अभियंताओं को उन्हीं कार्यालयों में तैनाती दी गई, जहां वह एसई के पदों का प्रभार देख रहे थे। यहां तक तो ठीक है, लेकिन इनमें से 3 अभियंता ऐसे थे जो विभिन्न शाखाओं में अधिशासी अभियंता के पदों पर कार्यरत थे, उन्हें भी उन्हीं  कार्यालयों में कार्यभार ग्रहण करने के आदेश जारी किए गए। बता दें कि जिन कार्यालयों में अधीक्षण अभियंता के पद ही नहीं हैं, वह उस कार्यालय में बिना पद के कैसे कार्यभार ग्रहण करेंगे।

कुछ निगम कार्मिकों का इस आदेश को लेकर कहना है कि इन शाखाओं मर्ज कर यहां अधीक्षण अभियंता के नए कार्यालय खोले जा रहे हैं। आदेश को लेकर सभी अपनी अलग-अलग राय रख रहे हैं।

निगम के चेयरमैन और सचिव पेयजल नितेश झा के द्वारा जारी इस अजीबोगरीब प्रमोशन आदेश की न केवल पेयजल निगम ही, बल्कि पूरे उत्तराखंड के सरकारी विभागों में चर्चा हो रही है। निगम में कुछ दिन पहले भी एक ऐसा ही आदेश चर्चा में है। ऋषिकेश से एक परियोजना प्रबंधक रिटायर हुए, जिसका चार्ज तीसरे जिले चमोली गढ़वाल के एक अभियंता को दिया गया, जबकि इस शाखा के आस-पास के अभियंताओं को यह प्रभार दिया जा सकता था। 200 किलोमीटर से अधिक दूर के अभियंता को प्रभार सौंपना किसी के गले नहीं उतर पा रहा है।

प्रमोशन के बाद 3 शाखाओं में वित्तीय अधिकार का संवैधानिक संकट 

पेयजल निगम में जिन तीन अधिशासी अभियंता कार्यालयों में पदोन्नत अधीक्षण अभियंताओं के नियम विरुद्ध कार्यभार ग्रहण करने के आदेश जारी किए गए हैं। उन शाखाओं में इस आदेश के बाद एक्सईएन की डाईंग पावर का संकट खड़ा हो गया है। नियमानुसार अधीक्षण अभियंता को पहले तो अधिशासी अभियंता के कार्यालयों में तैनाती नहीं दी जा सकती। यदि विषम परिस्थितियों में ऐसा होता भी तो ऐसे में एसई को ऐक्सईएन का वित्तीय अधिकार देने का प्रावधान नहीं है। स्पष्ट है कि प्रमोशन के बाद ये अभियंता नियमानुसार पेयजल योजना के खर्चे का भुगतान नहीं कर सकते। यदि वह एक्सईएन के वित्तीय अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, तो यह वित्तीय अनियमितता के दायरे में आएगा। जानकारों का मानना है कि यूपी जल निगम से लेकर उत्तराखंड के 21 साल के कार्यकाल मे इस तरह के आदेश नहीं हुए हैं। ऐसे में तैनाती का यह प्रकरण लंबा खिंचता है, तो इन शाखाओं में जल जीवन मिशन सरीखी कई पेयजल महत्वपूर्ण योजनाओं का निर्माण कार्य लटक सकता है।

एक सवाल यह भी उठ खड़ा हो रहा है कि निगम में ऐसा क्या संवैधानिक संकट खड़ा हो गया था कि शासन और निगम प्रबंधन को इस तरह का नियम विरुद्ध आदेश करना पड़ा। डीपीसी के बाद तैनाती को लेकर एक माह का समय क्या कम था। आजकल चुनाव आचार संहिता जैसी कोई अर्जेंसी भी नहीं लग रही थी कि जल्दबाजी में इस तरह का गोलमोल आदेश जारी किया गया। निगम अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के आदेश को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह नई परिपाटी अभियंताओं को ठेस पहुंचाने वाली है। भविष्य में इस तरह के आदेशों का कड़ा विरोध किया जाएगा।

” पेयजल निगम में अधीक्षण अभियंताओं के रिक्त 10 पदों पर सीनियरिटी के आधार पर प्रमोशन किए गए हैं। जो अधिशासी अभियंता जिस कार्यालय में तैनात थे उन्हें फिलहाल उसी कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करने के आदेश दिए गए हैं। अधिशासी अभियंता कार्यालयों में अधीक्षण अभियंता का कार्यभार ग्रहण करना सामान्य बात है। डिवीजनों में एसई का कार्यभार देखने वाले अभियंताओं को एक्सईएन की डाईंग पावर का अधिकार रहेगा। नई तैनाती तक यदि वह कोई वित्तीय लेन-देन करते हैं, तो उसे वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। एक सप्ताह के भीतर प्रोन्नत अधीक्षण अभियंताओं को नई तैनाती के आदेश जारी किए जाएंगे।”

उदयराज सिंह, प्रबंधक निदेषक, उत्तराखंड पेयजल निगम 

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