उत्तराखंड में मजाक बन कर रह गया वार्षिक स्थानान्तरण अधिनियम, एक्ट की आड़ में चल रहा बड़ा खेल 

उत्तराखंड कर्मचारी हलचल राजकाज
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देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी सेवकों के लिए लागू किया गया वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम 2017 मजाक बन कर रहा गया है। सरकार दावा कर रही है कि उत्तराखं में मजबूत स्थानांतरण एक्ट लागू किया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि इस एक्ट का लेशमात्र भी पालन नहीं हो रहा है। एक्ट इतना मजबूत है कि अफसर साल भर तक मनमर्जी से कभी भी किसी को स्थानांतरित कर दे रहे हैं, जबकि स्थानांतरण एक्ट में केवल 10 जून तक ही ट्रांसफर का प्रावधान है।

ऊपर से सरकार ने स्थानान्तरण सत्र शून्य घोषित किया हुआ है, इसके बाद भी विभाग सेटिंग-गेटिंग के फार्मूले से पूरे साल स्थानांतरण का खेल खेल रहे हैं। जिस तरह से नियम विरुद्ध स्थानांतरण के मामले सामने आ रहे हैं उससे लग रहा है कि विभागों में स्थानांतरण एक्ट अपात्र को पात्र बनाने का यंत्र बन गया है। बताया जा रहा है कि इस यंत्र की आड़ लेकर बड़े पैमाने पर लेन-देन का  व्यापार चल रहा है और सब कुछ मालूम होने के बाद भी सरकार आंखों में पट्टी बांधकर धृतराष्ट्र की भूमिका उदा कर रही है। जिससे पात्र कार्मिकों को इसका तनिक भी लाभ नहीं मिल रहा है।

दरअसल लोक निर्माण विभाग में हाल ही में 46 प्रभारी सहायक अभियंताओं के सहायक अभियंताओं के पदों पर हुई नियमित डीपीसी के बाद उन्हें जो पोस्टिंग दी गई है वह काफी चर्चाओं में है। कई सहायक अभियन्ताओं को स्थानांतरण एक्ट 2017 के विरुद्ध तैनाती दी गई है। दुर्गम में वर्षों से कार्यरत अभियंताओं को और दुर्गम स्थानों पर भेजा गया है, जबकि सुगम स्थानों पर कार्यरत अभियंताओं को और सुगम स्थानों पर तैनाती दी गई है।

इन उदाहरणों से आप भी समझ जाएंगे कि किस तरह से उड़ाई जा रही एक्ट की धज्जियां

विभाग में पिछले 17 वर्षों से दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत रहने के बाद प्रभारी सहायक अभियंता तुलाराम को पदोन्नति के बाद सहायक अभियंता के पद पर अल्मोड़ा से कोसों दूर लोहाघाट भेज दिया गया। सुगम क्षेत्रों में इन्होंने एक दिन भी काम नहीं किया है। लेकिन एक्ट के अनुसार पात्र होने के बाद भी अफसरों की दृष्टि में यह एक्ट के दायरे में नहीं आए। इसी तरह रवि कुमार को गौचर से पौड़ी भेजा गया। यह भी 19 साल से दुर्गम क्षेत्रों में सेवाएं दे चुके हैं। सुगम में कभी तैनात ही नहीं रहे हैं। हरीश सिंह को भी उत्तरकाशी से श्रीनगर भेजा गया है। यह भी 17 साल से दुर्गम इलाकों में ही सेवारत रहे हैं। 17 साल से दुर्गम क्षेत्रों में कार्यरत रहने के बाद धर्मेंद्र सिंह को भी सहिया से सीधे थराली भेजा गया हैं। भुवन चंद को भी बागेश्वर से अस्कोट भेजा गया है। यह भी 17 साल से दुर्गम में ही सेवारत रहे हैं। एक्ट में प्राविधान है कि 10 साल दुर्गम में रहने वाले कार्मिकों को सुगम में अनिवार्य रुप से तैनाती दी जाएगी। लेकिन दुर्भाग्य से एक्ट के अनुसार सुगम क्षेत्रों में तैनाती के पात्र होने के बाद भी इन अभियंताओं को सुगम क्षेत्रों में तैनाती नहीं दी गई है। केवल यही नहीं इनके जैसे कई अभियंता हैं, जो पात्र होने के बाद भी एक्ट के दायरे में नहीं आ रहे हैं, जबकि एक्ट का हवाला देकर अपात्रों को सुगम स्थलों पर मनचाही पोस्टिंग दी जा रही है।

दूसरी ओर पदोन्नत सहायक अभियंता परवेज आलम को नैनीताल से काशीपुर लाया गया है। जबकि यह 12 साल से सुगम स्थलों पर तैनात रहे हैं। इनकी केवल 5 साल की सेवा ही दुर्गम में रही है। प्रकाश चंद्र पंत को टनकपुर से नैनीताल लाया गया है यह भी 9 साल से सुगम में तैनात रहे हैं। दुर्गम में इनकी केवल 7 साल की सेवा है। पंकज राय को भी हल्द्वानी से कुछ ही दूरी पर काशीपुर लाया गया है। यह भी 10 साल से सुगम स्थल पर तैनात हैं। केवल 7 साल ही यह अब तक दुर्गम में तैनात रहे हैं।

यह स्थानांतरण एक्ट का कैसा पालन कराया जा है कि महज 5 साल दुर्गम में कार्यरत अभियंता सुगम में स्थानांतरण की पात्रता की श्रेणी में आ रहे हैं और 19 साल तक दुर्गम में सेवा करने वाले एक्ट के दायरे में नहीं आ रहे हैं, वह भी तब जबकि वह सुगम में एक बार भी कार्यरत नहीं रहे हैं। जिनके लिए यह एक्ट बनाया गया है उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है, तो एक्ट के औचित्य पर सवाल उठना लाजमी है।

एक ही डिवीजन में दो-दो अभियंता स्थानांतरित

लोनिवि में स्थानांतरण में कितनी पारदर्शिता है। इसका उदाहरण इस बात से लगाया जा सकता है कि विभाग ने तीन डिवीजनों में दो-दो अधिशासी अभियंताओ के तैनाती के आदेश कर दिए। निर्माण खंड अस्कोट में आशुतोष कुमार कार्यरत थे। इस डिवीजन में वीके सिन्हा को भी अधिशासी अभियंता बनाकर भेजा गया। यही नहीं बेरीनाग और नई टिहरी में भी इसी तरह दो-दो अभियंताओं की पोस्टिंग कर दी गई। यह मामला भी विभाग में खूब चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐसे में सवाल यह है कि एक पद पर दो अधिशासी अभियंताओं की तैनाती कहां तक सही है। यह विभागीय त्रुटि है या फिर मामला कुछ और ही है।

अधिशासी अभियन्ताओं की स्थानांतरण भी किए जा चुके हैं संशोधित

इससे पूर्व लोक निर्माण विभाग में गत माह 31 अगस्त को बड़े स्तर पर अधिशासी अभियन्ताओं के तबादले किये गए थे, लेकिन बाद में कई अभियन्ताओं के तबादले संशोधित किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि स्थानांतरणों में पूरी तरह से पारदर्शिता नहीं बरती गई है। एक्ट के विरूद्ध हुए कतिपय तबादलों को विभाग को निरस्त करना पड़ा।

एडीबी के तीन डिवीजन तीन साल से रक्ति, चीफ आफिस में 5-5 अधिशासी अभियंता तैनात

एक ओर जहां कतिपय डिवीजनों में तैनाती को मारामारी है वहीं कई डिवीजन वर्षों से रिक्त चल रहे हैं। विभाग द्वारा कतिपय डिवीजनों में दो-दो अधिषासी अभियंताओं की तैनाती की जा रही है जबकिएडीबी नैनीताल, पंतनगर और अल्मोड़ा डिवीजन में अधिषाी अभियंताओं के पद पिछले तीन साल से रिक्त चल रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि चीफ आफिस हल्द्वानी में 5-5 अधिषासी अभियंता अटैच हैं। एक ओर फील्ड में अभियंताओं की कमी है और दूसरी और स्वीकृत पद से अधिक अभियंता चीफ दफतर में कार्यरत हैं। यह किसी के गले नहीं उतर रहा है।

क्या कहता है स्थानांतरण एक्ट

एक्ट के बिंदु संख्या 7 के ग के अनुसार सुगम क्षेत्र से दुर्गम क्षेत्र में स्थानांतरित किए जाने वाले कार्मिकों को दुर्गम क्षेत्र में तैनाती संबंधी अवधि पूर्ण करने पर उन्हें अनिवार्य रूप से पुनः सुगम क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाएगा और दुर्गम स्थान से अवमुक्त होने की तिथि का स्पष्ट उल्लेख उनके आदेष में भी किया जाएगा।

एक्ट में केवल इन्हें दी गई है छूट

1. एक्ट के बिंदु 7 के घ में भी छूट का स्पष्ट उल्लेख है कि वरिष्ठ कार्मिक स्थानान्तरण में छूट दी जाएगी
2. ऐसे कार्मिक जो दुर्गम क्षेत्र में पूर्व में ही न्यूनतम 10 वर्ष की सेवा पूर्ण कर चुके हों।
3. धारा 3 के अधीन गंभीर रुप से रोगग्रस्त या विकलांगता की श्रेणी में आने वाले कार्मिक, जो कि सक्षक प्राधिकारी का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करे।
4. ऐसे पति-पत्नी जिका इकलौता पुत्र-पुत्री विकलांगता की परभिाषा में सम्मिलित हो।

प्रमुख अभियन्ता बोले, सुगम-दुर्गम कुछ नहीं होता

लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता हरिओम शर्मा ने इस संबंध में कहा कि प्रभारी सहायक अभियंताओं की डीपीसी नियमानुसार की गई है। पदोन्नति के बाद नई तैनाती के आदेश शासन स्तर से जारी हुए हैं। इसकी मुझे जानकारी नहीं है। यदि इसमें नियमों का कहीं उल्लंघन हुआ है या किसी तरह की गड़बड़ी की अंदेशा है तो इसका संज्ञान लेकर शासन को अवगत कराया जाएगा। सुगम-दुर्गम कुछ नहीं होता है। सरकारी सेवा में सेवारत कार्मिकों को उत्तराखंड में कहीं भी स्थानांतरित कर भेजा जा सकता है।

इंजीनियर्स संघ के पदाधिकारियों ने उठाए सवाल

उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स संघ, लोक निर्माण विभाग के प्रांतीय अध्यक्ष, आरएस मेहरा और प्रांतीय महामंत्री एसएस चैहान ने लोक निर्माण विभाग में स्थानांतरण प्रक्रिया में भेदभाव का आरोप लगाया है। नेताद्वय ने कहा कि विभाग में स्थानांतरण एक्ट 2017 का कतई भी पालन नहीं हो रहा है। अफसर एक्ट का लगातार उल्लंघन कर मनमर्जी से स्थानांतरण कर रहे हैं। नियमों का पाठ उसे पढ़ाया जा रहा है, जो स्थानांतरण के पात्र हैं। जुगाड़ से स्थानांतरण कराने वालों को माफीदार की श्रेणी में रखा जा रहा है। लागू स्थानांतरण एक्ट की धारा 27 का खुले पर दुरुपयोग किया जा रहा है। एक्ट के तहत में 10 जून तक ही स्थानांतरण का प्राविधान है, लेकिन अफसरों द्वारा पूरे साल मनमर्जी से स्थानांतरण किए जा रहे हैं। जून तक विभाग की नजर में कोई भी अभियंता स्थानान्तरण का पात्र नहीं था, लेकिन दो माह बाद दर्जनों तबादले किए गए है। यह चमत्कार कैसे हो गया। ईमानदारीेे से काम रहे अभियंताओं को सुगम के पात्र होने के बाद भी दुर्भावनापूर्ण तरीके से दुर्गम स्थानों पर भेजा रहा है। स्थानांतरण छूट की किस श्रेणी में किया गया है। इसका स्थानांतरण आदेश में कोई उल्लेख नहीं किया जा रहा है, जो एक्ट का सीधा उल्लंघन है। जबकि चहेतों को लगातार सुगम में मनमानी पोस्टिंग दी जा रही है। प्रभारी सहायक अभियंताओं की नियमित डीपीसी के बाद की गई नई तैनाती में स्थानांतरण एक्ट के तहत नवीन तैनाती नहीं दी गई है। अधिकारों से वंचित करने से अभियन्ताओं में भारी आक्रोश है। नेताद्वय ने कहा कि इस संबंध में विभाध्यक्ष को अवगत कराया गया है। लापरवाही और गड़बड़ी को शीघ्र संशोधित नहीं किया गया, तो वह आंदोलन के लिए तैयार हैं।

80 thoughts on “उत्तराखंड में मजाक बन कर रह गया वार्षिक स्थानान्तरण अधिनियम, एक्ट की आड़ में चल रहा बड़ा खेल 

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