उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन को डाटाबेस होगा तैयार, रिसर्च में जुटा ‘यूसैक’

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– आपदा प्रबंधन की चुनौतियों और सूचनाओं के सरलीकरण को लेकर उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (यूसैक) में एक दिवसीय कार्यशाला सम्पन्न

जनपक्ष टुडे संवाददाता, देहरादून। उत्तराखंड आपदा के लिहाज से काफी संवेदनशील है। भविष्य में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों और सूचनाओं के सरलीकरण को लेकर उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (यूसैक) ने वीरवार को एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया, जिसमें विषय विशेषज्ञों समेत विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अफसरों ने विचार साझा किए। इस अवसर पर यूसैक के निदेशक प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट ने बताया कि उत्तराखंड में पर्यटन को नया मूमेंट देने और आपदा प्रबंधन के लिए इफेक्टेड डाटाबेस तैयार किया जा रहा है, जिसमें सभी विभागों को शामिल किया जा रहा है। भविष्य में जरूरत पड़ने पर एक क्लिक पर डाटा उपलब्ध हो सकेगा।

उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (यूसैक) द्वारा हिमालय नॉलेज नेटवर्क (एच.के.एन) के अन्तर्गत उत्तराखण्ड में आपदा प्रबंधन को लेकर आयोजित एक दिवसीय परामर्श कार्यशाला में उत्तराखण्ड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, वन विभाग, आई. आई. आर. एस., केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रूड़की, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रूड़की, एस. डी. आर. एफ., एन. डी. आर. एफ., भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल, मौसम विभाग एवं डी. बी. एस. कॉलेज, देहरादून के वरिष्ठ अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने प्रतिभाग किया।

परामर्श कार्यशाला का उद्देश्य उत्तराखण्ड राज्य में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों, उपलब्ध आंकड़ों और सूचनाओं की स्थिति का चिन्हिकरण कर राज्य की प्राथमिकता के अनुरूप नीति दस्तावेज तैयार करना था।

कार्यशाला में यूसैक के निदेशक प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट ने समस्त प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए यूसैक द्वारा किए जा रहे कार्यकलापों की जानकारी दी। साथ ही रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली तकनीकी से सृजित एवं एकत्रित सूचनाओं के बारे में भी अवगत कराया।  उन्होंने बताया कि सूचना का साझाकरण और उनको उचित समय पर नीति निर्धारणकर्ताओं को पहुँचाना अति आवश्यक है।

प्रोफेसर बिष्ट ने बताया कि उत्तराखण्ड राज्य में आपदा से सम्बंधित सूचनाओं को विभिन्न राष्ट्रीय और राजकीय विभागों द्वारा समय-समय पर संकलित किया जा रहा है। इन सूचनाओं को सम्बंधित विभागों द्वारा समय-समय पर राहत एवं बचाव कार्य से सम्बंधित विभागों के साथ साझा की जानी चाहिए, जिससे आपदा से होने वाले नुकसान को न्यून किया जा सके।

कार्यशाला के मुख्य वक्ता निशान वर्मा, मुख्य वन संरक्षक, (आपदा प्रबंधन), उत्तराखण्ड वन विभाग ने कहा कि उत्तराखण्ड में दावानल एक बड़ी आपदा है, जिससे सम्बंधित आंकड़ों का उचित सृजन करना, स्थानीय लोगों की भागीदारी को बढ़ावा देना और आधुनिक तकनीकी,  विभिन्न सहयोगी विभागों और संस्थानों के सहयोग से वनाग्नि प्रबंधन को अधिक प्रभावी किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वन विभाग द्वारा राज्य में बहुउद्देशीय मॉडल क्रू श्टेशन विकशित किये जा रहे हैं।

इस अवसर पर उत्तराखण्ड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक मे मेजर राहुल जुगरान ने आपदा प्रबन्धन हेतु विभन्न विभागों द्वारा सृजित सूचना का सरलीकरण कर आपदा क्षेत्र हेतु प्रभावी बनाये जाने की आव्श्यकता पर बल दिया, जिससे राज्य के दूरस्थ स्थानों में स्थित लोगों को लाभ प्राप्त हो सके।

हिमालय नॉलेज नेवटर्क के नोडल अधिकारी डॉ. गजेन्द्र सिंह ने बताया कि यूसैक द्वारा राज्य इकाई के रूप में पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं मसलन कृषि, ग्लेशियरों, कार्बन सिंक वैल्यू, सांस्कृतिक एवं जैविक विविधता के क्षेत्रों में समृद्ध होने के बावजूद भी पर्वतीय क्षेत्रों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र में 145 से अधिक विश्वविद्यालय 2000 से अधिक प्रोफेसर और 500 से अधिक वैज्ञानिक कार्यरत है, फिर भी विभिन्न संस्थानों में सूचना की सीमित साझेदारी है, जिसके अधिक से अधिक साझाकरण हेतु हिमालय नॉलेज नेवटर्क की स्थापना की गई है।

कार्यशाला में प्रतिभाग कर रहे आई.आई.आर.एस. के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अरिजीत रॉय, केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रूड़की, के वैज्ञानिक मनोजित सामंथा, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रूड़की, के वैज्ञानिक डॉ. विशाल सिंह एवं डी. बी. एस. के प्राध्यापक डॉ. दीपक भट्ट ने हिमालय क्षेत्रों से सम्बंधित आपदाओं राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे शोध कार्यों से अवगत करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के लिए मल्टी-हैजार्ड आंकलन की अति आवश्यकता है। साथ ही आपदा प्रबन्धन से संभंधित विभागों की स्थानीय इकाइयों को शुदृढ़ करते हए समय -समय पर नवीनतम तकनीकी का प्रशिक्षण प्रदान करना आवश्यक है।

इस अवसर पर भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिक रोहित थपलियाल ने बताया कि राज्य में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन व ऑटोमैटिक रेन गेज की संख्या 150 से अधिक है, जिससे प्राप्त आंकड़ों की जानकारी समय – समय पर विभागों से साझा किये जाते रहे हैं।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल केडी कमान्डेंट प्रदीप भट्ट, एस. डी. आर. एफ., ए. कमान्डेंट अजय भट्ट एवं एन. डी. आर. एफ., ए. कमान्डेंट करवीर सिंह भंडारी व इंस्पेक्टर अमीर चंद ने इस अवसर पर बताया कि विभन्न विभागों के द्वारा प्राप्त सूचनायें आपदा राहत बचाव कार्यों में सहायक होते है। साथ ही रेस्पोंस टीम को समय -समय पर तकनीकी के क्षेत्र में बेसिक ट्रेनिंग की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यशाला का संचालन कर रहे यू-सैक के वैज्ञानिक व परियोजना के नोडल अधिकारी श्री शशांक लिंगवाल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कहा कि कार्यशाला से प्राप्त सुझावों के आधार पर यूसैक शीघ्र ही एक गुणवत्त थीमेटिक डाक्यूमेन्ट तैयार करेगा, जिसे नीति-निर्धारकों की अनुमति उपरान्त विषयगत दस्तावेजीकरण कर नीति आयोग को प्रदान किया जायेगा।

हिमालयन नॉलेज नेटवर्क: एक संक्षिप्त परिचय हिमालयन नॉलेज नेटवर्क क्षेत्रीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्राथमिकताओं जैसे- गरीबी उन्मूलन, स्वस्थ समाज, सतत विकास, पर्यावरण सुरक्षा तथा जैव विविधता संरक्षण आदि कुल 17 क्षेत्रों के अनुरूप हिमालय क्षेत्र के संरक्षण और विकास को बढ़ावा देने तथा पर्यावरणीय चुनौतियों को दूर करने के लिए विज्ञान-नीति-अभ्यास, इंटरफेस से डेटा और सूचना साझा करने की सुविधा प्रदान करना है। इस परियोजना का संचालन गोविन्द बल्लभ पन्त पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा द्वारा सभी 11 हिमालयी राज्यों व 02 केन्द्र शाशित प्रदेशों में चलायी जा रही है। जिसमें उत्तराखण्ड राज्य के लिए यू-सैक को नोडल एजेंसी नामित किया गया है।

 

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