हिंदी दिवस: भाषा संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है हिंदी

उत्तराखंड समाज-संस्कृति
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हिंदी दिवस पर सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अनेक कार्यक्रम सम्पनी हुए। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि भाषा संवाद संप्रेषण का सशक्त माध्यम है। मनुष्य को इसलिए भी परमात्मा की श्रेष्ठ कृति कहा जाता है कि वह भाषा का उपयोग कर अपने भावों को अभिव्यक्त करने में सक्षम है। यही विशेषता है जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से भिन्न करती है।

विश्व में 6809 से अधिक भाषाएं और असंख्या बोलियां हैं, जिसमें भाषा के रुप में हिन्दी भी है, हिन्दी विश्व की दूसरी बड़ी भाषा होने के कारण इसका व्यक्तित्व इसकी वर्णमाला के कारण विराट है। हिन्दी की सबसे बड़ी विशेषता है कि हिंदी को जैसा बोला जाता है,वैसा ही सुना जाता है और वैसा ही लिखा भी जाता है। निस्संदेह,हिन्दी में सामर्थ्य की सुगंध है।

अगर देखा जाए तो जो सामर्थ्य की सुगंध हिन्दी के पास है। वह अन्य दूसरी भाषाओं के पास नहीं है। फिर भी हिन्दी के अनादरित का कारण भारत में रहने वाला तथाकथित अभिजात्य वर्ग है, जिसकी नाक के नथुने हिन्दी के सामर्थ्य की सुगंध से फड़कने लगते हैं। मातृभाषा जब मात्र कुछ लोगों की भाषा बनकर रह जाए तो उसका कैसा और कितना विकास होगा यह सहज चिंतनीय है।
हिन्दी भाषा में मादकता, आकर्षक और मोहकता भी है। यही कारण है कि रूस के वरान्निकोव और बेल्जियम के बुल्के भारत आकर हिन्दी को समर्पित हो गए। बोलने को तो फ्रेंच भी एक भाषा है,परंतु आकर्षक और मोहक नहीं। इंटेलियन भाषा आकर्षक है, परंतु मादक और मोहक नहीं। चीनी भाषा न तो मादक है,न आकर्षक और न ही मोहक है।
इन्हीं सब कारणों से हिन्दी अपने गुणों पर गौरवान्वित है। विश्व हिन्दी दिवस प्रतिवर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व भर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए वातावरण निर्मित करना और हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है।
पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन नागपुर में 10 जनवरी,1975 को आयोजित किया गया था, इसलिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। सर्व प्रथम विश्व हिंदी को मनाने की सुरुआत भारत में 10 जनवरी,2006 को हुई थी।हमारा देश लंबे समय तक अंग्रेजों की दासता के अधीन रहने के कारण भारत में विश्व हिंदी दिवस के अलावा हर साल 14 सितंबर को ‘हिंदी दिवस’ मनाया जाता है।
जाहिर-सी बात है कि गुलाम देश के पास अगर अपनी कोई राज या राष्ट्रभाषा नहीं होती तो परतंत्र राष्ट्र बिन भाषा के गूंगे अपाहिज की तरह रहता,जो अपनी आंखों के सामने देखता तो सबकुछ परन्तु बोल नहीं सकता। भारत में रक्तरंजित क्रांति के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने भारत में हिन्दी को राजभाषा की मान्यता मिली।
इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
भारत में आजादी से पूर्व देश में हिन्दी का प्रयोग शून्य था,बल्कि हिन्दी भारत को आजाद कराने में एक सैनिक की भांति लड़ी थी और इसका प्रयोग उस समय भी सर्वाधिक था। लेकिन समय की करवट के साथ हिन्दी का आकाश सूना होता गया।
आजादी के बाद भारतीय अंग्रेजी को भूलाने के बजाय और भी अंग्रेजी के दीवाने होते चले गए। मां के जगह मम्मी और पिता की जगह डैड हो गया।बस इसी में सब बैड हो गया ! ओर फिर हिन्दी को एक दिन की भाषा बनाकर ऐसे याद किया जाने लगा कि जैसी किसी की पुण्यतिथि हो।
आज भारत ही नहीं विदेशी भी हिन्दी भाषा को अपना रहे हैं तो फिर हम देश में रहकर भी अपनी भाषा को विद्यालयी पाठ्यक्रम का माध्यम अंग्रेजी को बनाकर हिंदी को बढ़ावा देने के बजाय उसको खत्म करने पर तुले हैं?
विश्व में अनेक देश जैसे- इंग्लैंड, अमेरिका, जापान और जर्मन आदि अपनी भाषा पर गर्व महसूस करते हैं तो हम क्यों नहीं? चीन की अर्थव्यवस्था भारत से 3 गुनी बड़ी है, आज वहां बिजली, पानी, आवास, चिकित्सा, रोज़गार अथवा गरीबी जैसे मुद्दे काफ़ी हद तक न के बराबर हैं।
भारत 1947 में आज़ाद हुआ और चीन जो जापान के साथ द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका में और आतंरिक संघर्षों के कारण लगभग बर्बाद हो गया था, वहां 1949 में कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ। गरीबी, कुपोषण, अनियंत्रित जनसंख्या, महामारियां और खस्ती आर्थिक व्यवस्था किसी भी देश के लिए बड़ी चुनौती थीं, लेकिन चीन ने दृढ़ता से सबका मुक़ाबला किया।
भारत में अंग्रेजी जितनी फायदेमंद भारतीयों के लिए मानी जाती है, उससे हज़ार गुना ज्यादा लाभ अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा के लिए भारत से कमा लेती है। कभी सोचा है कि अपनी विशाल प्राचीन संस्कृति के रहते भी भारत के लोग एक पिद्दी से देश इंग्लैंड को महान क्यों मानते हैं, जबकि उसके पड़ोसी फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, स्पेन,पुर्तगाल,इटली इत्यादि उसकी ज्यादा परवाह नहीं करते।
इसका कारण है,हमने इंग्लैंड की भाषा को महान मान लिया, लेकिन उसके पड़ोसियों ने नहीं माना।
आज भाषा को लेकर संवेदनशील और गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि क्या अंग्रेजी का कद कम करके ही हिन्दी का गौरव बढ़ाया जा सकता है?
जो हिन्दी कबीर, तुलसी, रैदास, नानक,जायसी और मीरा की भजनों से होती हुई प्रेमचंद,प्रसाद, पंत और निराला को बांधती हुई भारतेंदु हरिशचंद्र तक सरिता के भांति कलकल बहती रही, आज उसके मार्ग में अटकलें क्यों हैं? और आज आजाद भारत में हिन्दी कर्क रोग से पीड़ित क्यों है?
अफसोस इस बात का भी है कि हम हिन्दी का यश बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध तो है,पर नवभारत नहीं न्यू इंडिया में। यदि माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश का वास्तविक कायाकल्प करना चाहते हैं, तो हिन्दी को उसकी गरिमा पुनः लौटाये। डिजिटल इंडिया के इस युग में चरमराती हिन्दी को चमकाना होगा। तकनीकी और वैज्ञानिक दौर में हिन्दी के लिए अप्रत्यक्ष रूप से बाध्यता अनिवार्य करनी होगी।
उदाहरण के लिए गूगल जैसे बड़े सर्च इंजन की ही ले तो इस पर सर्च करने के बाद 90 फीसदी परिणाम अंग्रेजी में आते हैं, जबकि इसके विपरीत 90 फीसदी परिणाम हिन्दी में लाने होंगे। सरकारी वेबसाइट को हिन्दी में रूपांतरित करने से लेकर ऑन या ऑफलाइन फॉर्म सभी को हिन्दी में परिवर्तित या इनका नवीनकरण करना इस दिशा में एक सार्थक कदम होगा। इस तरह अनेक छोटी-छोटी कोशिश मन से की जाये तो हिन्दी के प्रति एक सुखद माहौल तैयार किया जा सकता है।
आज प्रत्येक भारतीय को राष्ट्र को उन्नति के शिखर पर ले जाने के लिए हिन्दी के प्रति हीनता के बोध को मन से हटाना होगा और वैचारिक और मानसिक रुप से अंग्रेजी के दासता का त्यागकर अपने राष्ट्र अपनी भाषा का आदर करते हुए इसे विकसित एवं समृद्धशाली बनाने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहना होगा।
भारत में भाषा का गौरव शून्य होने से पता चलता है, कि आज हम उसका मूल्य भूल चुके हैं। हालात ऐसे बन गये हैं कि आज हिन्दवासियों को अंग्रेजी की गाली भी प्रिय लगने लगी है। वस्तुतः सौंदर्य और सुगंध से परिपूर्ण हिन्दी का यश मिटता जा रहा है। आलम है कि हम हिन्दी को कुलियों की और अंग्रेजी को कुलीनों की भाषा मानने लगे हैं।

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