शर्मनाक: उत्तराखंड की रवांई घाटी में प्रसव पीड़ा से तड़पती एक और महिला ने तोड़ा रास्ते में दम, आखिर बेमौत मरती इन जिंदगियों का गुनहगार कौन?

उत्तराखंड जनपक्ष समाज-संस्कृति स्वास्थ्य
खबर शेयर करें

उत्तरकाशी/देहरादून। सीमांत जनपद उत्तरकाशी के सुुुदूर क्षेत्र रवांई घाटी में लचर स्वास्थ्य व्यवस्था ने एक और महिला की जान ले ली। प्रसव पीड़ा से कराहती महिला ने देहरादून अस्पताल पहुंचने से पहले रास्ते में ही दम तोड़ दिया। प्रसव पीड़ा से यह पहली मौत नहीं है। ऐसी मौतें हर हफ्ते देखने को मिल रही है। सवाल यह है कि कब तक महिलाएं प्रसव पीड़ा से बेमौत मरती रहेंगी। इसकी चिंता न सरकार को है, न स्वास्थ्य महकमे को और न ही क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को है। चुनाव कैसे जीतें यह सबकी चिंता है।

ताज्जुब की बात यह है कि उत्तराखंड में राजनीतिक दलों में 50-100 रुपये की बिजली मुफ्त देने की होड़ मची है, लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बेमौत काल के गाल में समा रही जिन्दगियों के बारे में कुछ करने को राजी नहीं है। क्या 50-100 रुपये की बिजली जिंदगी की कीमत से बड़ी है। क्या इस पर विपक्षी दलों को आवाज नहीं उठानी चाहिए। गम्भीर बात यह है कि यदि अभी हालात नहीं सुधरे तो भविष्य में महिलाओं के लिए बच्चे जनना अभिशाप बन जायेगा।

जानकारी के अनुसार प्रसव पीड़ा होने पर एक महिला को बीते रोज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पुरोला में भर्ती कराया गया था। महिला की ब्लीडिंग न रुकने पर उसे देहरादून के लिए रैफर किया। लेकिन असहनीय प्रसव पीड़ा से तड़पती 25 वर्षीय महिला ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। यह केवल एक माँ ही जिंदगी की जंग नहीं हारी है, उसके साथ कई रिश्ते भी हमेशा के लिए मर गए हैं।

आखिर प्रसव पीड़ा से महिलाएं कब तक शहादत देती रहेंगी, यह बड़ा प्रश्न है। क्षेत्रीय लोगों का गुस्सा यह है कि रवांई क्षेत्र के 200 किलोमीटर की परिधि में एक भी महिला चिकित्सक नहीं है। राज्य बनने के 20 साल बाद भी क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि अस्पतालों में चिकिसकों की तैनाती नहीं हो पाई है। जबकि हर चुनाव में यह मुख्य मुद्दा रहता है।

पहाड़ के अस्पताल सुविधाओं के अभाव में महज रैफरल सेंटर बने हुए हैं। यदि सरकार में थोड़ा सी भी गैरत बची है तो कम से कम पहाड़ों में इस तरह प्रसव पीड़ा से बेमौत मर रही जिंदगियों को तो बचाया ही जा सकता है।

बताया जा रहा है कि रवांई घाटी से लगे जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर और ओबीसी क्षेत्र रवांई जौनपुर भी पड़ता है, लेकिन यहां भी एक स्तरीय सरकारी अस्पताल नहीं है। यमुनाघाटी में दो प्रमुख सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र है, जहां रोजाना 250 से 350 ओपीडी मरीज हैं, यहां पर एक भी Gynaecologist surgeon( महिला चिकित्सक), सर्जन, Orthopedic surgeon( हड्डी रोग विशेषज्ञ) blood bank व lab technician चिकिसक नहीं है।

लोगों का कहना है कि समय पर इलाज मिल जाए तो प्रसव पीड़ा से होने वाली असामयिक मौतों को रोका जा सकता है। 200 किलोमीटर के दायरे में भी एक अदद अस्पताल न होना आदम जमाने जैसा है। राजनीतिक पार्टियां चुनाव में तो बड़े-बड़े दावे करते है, लेकिन जितने के बाद न तो सत्ताधारी दल इस पर काम करता है और न ही विपक्षी पार्टियां ही सरकार को उसके वादे याद दिलाती है।

जब चुनाव आते हैं तो पक्ष-विपक्ष की याद दासतें वापस आ जाती हैं। कम से कम अब लुक्का-छुप्पी और जनता को गुमराह करने का यह खेल बन्द होना चाहिए और जमीन पर काम करके बेकसूर हो रही मौतों पर बचाने को जमीन पर काम शुरू होने चाहिए।

850 thoughts on “शर्मनाक: उत्तराखंड की रवांई घाटी में प्रसव पीड़ा से तड़पती एक और महिला ने तोड़ा रास्ते में दम, आखिर बेमौत मरती इन जिंदगियों का गुनहगार कौन?

  1. Pingback: 3laureate
  2. [url=https://medrxfast.com/#]prescription drugs online without doctor[/url] legal to buy prescription drugs without prescription