गजब: जल संस्थान में 2020 में एई के पद पर पदोन्नत अभियन्ता सीनियरिटी लिस्ट में सबसे ऊपर

उत्तराखंड राजकाज
खबर शेयर करें
  • अनदेखी: 2013 के भर्ती सहायक अभियंता 2011 के अभियन्ताओं से हो गए वरिष्ठ, कठघरे में मौलिक नियुक्ति

देहरादून। उत्तराखंड पेयजल निगम के बाद उत्तराखंड जल संस्थान में भी पूर्व से विवादों में चला आ रहा सहायक अभियंताओं की वरिष्ठता का मामला एक बार फिर गरमा गया है। जल संस्थान प्रबंधन द्वारा हाल ही में जारी की गई वरिष्ठता सूची में तमाम गड़बड़ियां बताई जा रही है, जिसके बाद आक्रोशित अभियन्ताओं ने इसका विरोध करना शुरू जर दिया है।

विभागीय उच्चाधिकारियों का कहना है कि वरिष्ठता सूची को पूरी पारदर्शिता से तैयार किया गया है, लेकिन पारदर्शिता कितनी है वह इस बात से स्पष्ट हो जाती है कि 2013 में नियुक्त कई सहायक अभियंताओं को 2011 के सहायक अभियंताओं से ऊपर रखा गया है। कई को गलत तरीके से नोशनल पदोन्नति देकर सीनियरिटी में जूनियर होने के बावजूद ऊपर रखा गया है। इस तरह की एक नहीं इसमें कई खामियां हैं, जिससे अभियन्ताओं में भारी आक्रोश है।

अभियंताओं का कहना है कि वरिष्ठता सूची को आनन-फानन में जारी किया गया है। वरिष्ठता निर्धारण न तो नियमों के अनुरुप किया गया है और न ही इसमें कोर्ट के आदेशों का ही पालन किया गया है। अभियंताओं का आरोप है कि विभाग ने चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए सेवा नियमावली को ताक पर रख कर वरिष्ठता निर्धारित की है। साथ ही हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों को भी ठेंगा दिखाकर मनमाने तरीके से मानकों के विपरीत वरिष्ठता सूची जारी की है, जो उन्हें मंजूर नहीं है।

पेयजल निगम की तरह उत्तराखंड जल संस्थान में भी सहायक अभियंताओं की वरिष्ठता का मामला आजकल चर्चाओं में है। आरोप है कि 117 अभियंताओं की इस वरिष्ठता सूची में 45 आपत्तियां थी, लेकिन अधिकांश आपत्तियों का निस्तारण नियमों के अनुरुप नहीं किया गया है।

सूत्रों की मानें तो विभाग वरिष्ठता मामले में हाईकोर्ट में एफिडेविट काउंटर करने जा रहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब विभाग हाईकोर्ट में एफिडेविट काउंटर करना था, तो उससे पहले वरिष्ठता सूची के अंतिमीकरण में जल्दबाजी क्यों दिखाई गई।

एक अभियन्ता को जागीर समझ 11 साल पूर्व से दिया सीनियरिटी का लाभ

अभियन्ताओं का आरोप है कि एक जूनियर इंजीनियर को सहायक अभियंता के पद पर की गई पदोन्नति चर्चा में है। विभाग ने सारे नियम कानून ताक पर रख कर मदन सैन को 11 साल बैक से एई के पद पर सेवा लाभ दे दिया। विभाग का यह कारनामा किसी के गले नहीं उतर रहा है। मदन सैन के मामले में कोर्ट के आदेश भी रद्दी की टोकरी में डाल दिये गए।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 2005 ने बाद पत्राचार से बीटेक करने को अमान्य घोषित कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के क्रम में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि पत्राचार से डिग्री करने वालों की डिग्री एआईसीटीई और यूजीसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाली परीक्षा को पास करने के बाद ही वैध मानी जायेगी।

मदन सैन ने दिसम्बर 2018 में परीक्षा पास की, तो कोर्ट के आदेशानुसार उन्हें डिग्री का लाभ 2019 दिया जाना चाहिए। विभाग ने सैन को 19 मई 2020 को जेई से एई के पद पर नोशनल पदोनन्ति दी, लेकिन सेवा का लाभ 1 जुलाई 2009 से दिया, जो सेवा नियमावली का खुले तौर पर उल्लंघन है।

सैन की नियम विरुद्ध पदोन्नति लाभ से सीधी भर्ती के अभियन्ताओं की वरिष्ठता गड़बड़ा गई है। सबसे जूनियर होने के बावजूद सैन को नई जारी सीनियरिटी लिस्ट में दूसरे स्थान पर रखा गया है, जिससे अभियन्ताओं में जबरदस्त आक्रोश है। अभियन्ता सैन के नियम विरुद्ध सेवा लाभ को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं।

शासन ने बदली अपनी ही बनाई 2017 की सीनियरिटी लिस्ट

उत्तराखंड शासन ने 2017 में सहायक अभियंताओं की वरिष्ठता सूची जारी की थी, लेकिन ट्रिब्यूनल के एक आदेश पर शासन ने यह वरिष्ठता सूची बदल दी, जबकि ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ कुछ अभियन्ताओं ने नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। मामला कोर्ट में अभी लम्बित है। 25 मार्च 2021 को इसमें सुनवाई है। मामला कोर्ट में विचाराधीन होने के बावजूद वरिष्ठता सूची का प्रकाशन करके विभाग ने कोर्ट की भी अवमानना की है।

अभियंताओं का कहना है कि यदि सीनियरिटी लिस्ट को जल्द से जल्द लागू कराना था, तो टीब्यूनल के आदेश को क्यों नहीं शासन ने हाईकोर्ट में चैलेंज किया। लेकिन ऐसा करने के बजाय नियम विरुद्ध वरिष्ठता निर्धारित कर दी। कई सीनियर इंजीनियरों को जूनियर कर दिया गया है। इससे अभियंताओं में विभाग के साथ ही शासन के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है।

वरिष्ठता निर्धारण में सेवा नियमावली का खुला उल्लंघन

उत्तराखंड सरकारी सेवक ज्येष्ठता नियमावली 2002 के नियम 7 में स्पष्ट रुप से उल्लेखित है कि जो पश्चातवर्ती चयन के परिणाम स्वरुप नियुक्त व्यक्ति पूर्ववर्ती चयन के परिणाम स्वरुप नियुक्त व्यक्तियों से कनिष्ठ होंगे। ऐसे में 2015 में भर्ती सहायक अभियंता 2011 के भर्ती अभियंताओं से वरिष्ठ नहीं हो सकते।

वरिष्ठता सूची के खिलाफ कोर्ट में अपील

वरिष्ठता सूची का मामला फिर कोर्ट पहुंच गया है। प्रभावित अभियंताओं ने मामले में हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी है। उनका कहना है कि कैचअप रुल का नियमावली में कोई प्राविधान ही नहीं है। एक ही संवर्ग में अलग-अलग वर्षों में नियुक्त अभियन्ताओं की वरिष्ठता पहले से नियुक्त अभियन्ताओं से कैसे ऊपर हो सकती है, यह समझ से परे है। उन्होंने वर्तमान में जारी वरिष्ठता सूची को तत्काल निरस्त करने के साथ ही आपत्तियों का सेवा नियमावली के अनुरुप वरिष्ठता निर्धारित करके 2017 की सीनियरिटी लिस्ट जारी करने की मांग की है।

मेरिट के आधार पर सीनियरिटी तय करना नाइंसाफी

जल संस्थान एक मात्र विभाग ऐसा है, जहां सिविल सुर विद्युत यांत्रिक की मेरिट के आधार पर वरिष्ठता तय की जा रही है। जबकि अलग-अलग चयन के बावजूद मेरिट के प्राप्तांक की तुलना करना नियम सम्मत नहीं है। इससे नौलीक नियुक्ति की प्रासांगिकता कठघरे में है।

अभियन्ताओं का आरोप है कि विभागीय अधिकारी कुतर्क देकर शासन और मंत्री को गलत तथ्य पेश कर रहे हैं। बता दें कि किसी भी अभियांत्रिकी विभाग में सिविल एवं विद्युत/यांत्रिकी संवर्ग एक नहीं है। जबकि जल संस्थान सिविल अभियंत्रण विभाग है। वर्ष 2014 में चयनित विद्युत/यांत्रिक अभियंता इसी कारण पीछे हो गए हैं।

अभियन्ता सिविल और विद्युत यांत्रिक की सीनियरिटी लिस्ट अलग-अलग करने की मांग कर रहे हैं। सिविल इंजीनियर ही नहीं विद्युत/यांत्रिक के अभियन्ता भी एक ही सीनियरिटी लिस्ट का विरोध कर रहे हैं। अभियंताओं का कहना है कि इसको लेकर शासन को भी प्रत्यावेदन दिए गए हैं, जिनका नियमानुसार निस्तारण नहीं किया गया है, जिससे आगे भी विवाद की स्थिति बनी रहेगी। इसलिए अभियन्ता वरिष्ठता सूची अलग-अलग करने की मांग कर रहे हैं।

जल संस्थान में सहायक अभियंताओं की वरिष्ठता में पूरी पारदर्शिता बरती गई है। यह वरिष्ठता सूची कई वरिष्ठ अधिकारियों ने तैयार की है। यदि इसके बाद भी आपत्ति है, तो उस पर विचार किया जाएगा। हाईकोर्ट के दिशा निर्देशों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। यदि कोर्ट का इस संबंध में कोई आदेश है, तो उसका वरिष्ठता निर्धारण से पूर्व संबंधित अधिकारियों ने संज्ञान ले लिया होगा, फिर भी यदि कोई कमी या त्रुटि रह गई हो, तो उसे सुधार लिया जाएगा। नितेश झा, पेयजल सचिव, उत्तराखंड

Leave a Reply

Your email address will not be published.