गजब: उत्तराखंड पेयजल निगम का एक चीफ इंजीनियर 15 दिन में भी नहीं कर पाया देहरादून से पौड़ी का महज 4 घंटे का सफर तय

उत्तराखंड कर्मचारी हलचल राजकाज
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– उत्तराखंड में ऑनलाइन ज्वाइनिंग का पहला मामला पेयजल निगम में आया सामने, देहरादून से महज 150 किलोमीटर की दूरी पर है पौड़ी मुख्यालय

देहरादून/पौड़ी। हे भगवान, उत्तराखंड में यह क्या हो रहा है। पहाड़ की राजधानी पहाड़ में हो, इस संकल्प के साथ सरकार गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर चुकी है, लेकिन अफसरों का मोह देहरादून, हरिद्वार, यूएसनगर और नैनीताल से नहीं छूट पा रहा है। सरकार की सोच है कि अधिकारी पहाड़ों में रहेंगे तो वहां का दर्द समझ सकेंगे और उसके अनुरुप विकास को तकनीकी के साथ जोड़कर आगे बढ़ाएंगे, लेकिन हो तो रहा है इसके ठीक उलट। पेयजल निगम में एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सरकार के सपनों को आइना दिखा रहा है।

जी हां, हम बात कर रह हैं उत्तराखंड पेयजल निगम की। बता दें कि पेयजल विभाग सबसे महत्वपूर्ण विभागों में से एक है। निगम के पास राज्य ही नहीं केंद्र सरकार की भी कई महत्वकांक्षी योजनाओं के संचालन का जिम्मा है। जल जीवन मिशन जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजना का क्रियान्वयन बहुत तेजी के साथ पूरा किया जाना है, जिसमें किसी भी तरह की हीला-हवाली पर केंद्र सरकार मदद भी रोक सकती है। चुनावी वर्ष होने के
कारण राज्य सरकार को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन पेयजल निगम के कुछ अफसर इस तरफ कोई ध्यान न देकर सरकार की फजीहत कराने का काम कर रहे हैं।

दरअसल हाल ही में पेयजल निगम मुख्यालय देहरादून में कार्यरत प्रभारी मुख्य अभियंता (मुख्यालय) केके रस्तोगी को स्थानांतरित करके प्रभारी मुख्य अभियंता पौड़ी गढ़वाल के पद पर भेजा गया है, लेकिन देहरादून से रिलीव होने के लगभग 15 दिन बीत जाने के बाद भी ये महाशय पौड़ी दफतर नहीं पहुंच पाए। बताया जा रहा है इनके द्वारा ज्वाइनिंग भी देहरादून से ऑनलाइन ही की गई, जो अपने आप में बिरला उदाहरण है।

विभागीय सूत्रों की माने तो इन महोदय द्वारा पौड़ी कार्यालय से डिस्पैच नंबर मंगाकर ज्वाइनिंग दी गई, जबकि ज्वाइनिंग के समय संबंधित कार्यालय में उपस्थित होना जरूरी होता है। उत्तराखंड में सम्भवतः यह पहली ऑनलाइन ज्वाइनिंग होगी। ऐसे में समझा जा सकता है कि जो अधिकारी ज्वाइन करने तक दफ्तर नहीं पहुंच पा रहा है वह काम क्या खाक करेगा और सरकार ऐसे अधिकारियो के भरोसे पहाड़ का विकास करने का सपना संजोए है।

आजकल विधानसभा सत्र चल रहा है, जिसमे प्रत्येक अधिकारी को अपने मुख्यालय में रहने के आदेश हैं, लेकिन ये मुख्य अभियंता बस सचिवालय के चक्कर काट रहे। यह बात भी सामने आ रही है की वह देहरादून में बैठ कर ही ड्यूटी बजा रहे हैं। बताया जा रहा है कि स्थानांतरण के बाद से वह देहरादून में ही घूम रहे हैं। उनके द्वारा अक्सर सचिवालय की परिक्रमा की जा रही है।

सत्रों के अनुसार रस्तोगी का सचिवालय कनेक्शन अपना नोशनल प्रमोशन कराने से जुड़ा है, जबकि इन पर मुख्य अभियंता मुख्यालय रहते हुए सीनियरिटी ऊपर-नीचे करने का आरोप है। शासन से अपनी नोशनल पदोन्नति कराने की फाइल के चक्कर में वह सचिवालय के चक्कर लगाने में जुटे हैं। उन्हें अपनी वरिष्ठता की तो चिंता है, लेकिन उस जनता की नहीं है, जो बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही हैं।

जल जीवन मिशन में ऐसे गांव-परिवारों को जोड़ा जाना है, जो पेयजल से विहीन है, लेकिन जब मुख्य अभियंता कार्यालय में ही नहीं बैठेंगे, तो काम कैसे होगा। इससे निश्चित तौर पर काम प्रभावित हो रहा है। योजना से संबंधित तमाम एस्टीमेट धूल फांक रहे हैं।

यह भी जानकारी मिली है कि रस्तोगी हमेशा से ही निगम में मनमौजी रहे हैं। हरिद्वार गंगा में प्रभारी जीएम के पद पर कार्यरत रहने के दौरान वह टेंडरों में घपले को लेकर विवादों में रहे हैं। इस दौरान इनके पास श्रीनगर और कर्णप्रयाग के परियोजना प्रबंधक का भी चार्ज रहा है, लेकिन वह कभी इन कार्यालयों में झांकने तक नहीं गए। हरिद्वार में बैठकर ही इनके द्वारा पहाड़ के दोनों ददफ्तरों का कार्य देखा गया। लगता है इन्हें पहाड़ के नाम से एलर्जी है। पहाड़ी राज्य में रहकर पहाड़ के लिए ऐसी नफरत आखिर कब तक बर्दाश्त की जाएगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की फटकार के बाद भी अफसर सुधरने को तैयार नहीं है। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य मेें देखें तो जैसे-जैसे टेक्नाॅलाजी आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे पर्वतीय क्षेत्रों से अफसरों का मोह भी भंग होता जा रहा है। सुविधाओं और तकनीकी का इस्तेमाल जनता के बजाय अफसर खुद के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। केके रस्तोगी इसके नायाब उदाहरण हैं।

उत्तराखंड में सरकार पूरी तरह चुनावी मोड में है, लेकिन अफसर सरकार और सरकारी योजनाओं के प्रति कतई गंभीर नहीं दिखाई दे रहे हैं। जानकारों का मानना है कि धामी सरकार को इस ओर कड़ा रुख अपनाने की जरुरत है। साथ ही शासन
विभागाध्यक्षों को भी ऐसे अफसरों के कार्य दायित्व के प्रति कड़ी निगरानी रख कर नकेल कसने की आवश्यकता है, ताकि दूसरे अफसरों के लिए यह नजीर बन सके।

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