उत्तराखंड में लूट के अड्डे बने अस्पताल, ब्लैक फंगस के एक मरीज से इलाज को मांगे 25 लाख

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– बगैर इलाज कराए  गम्भीर रोगी को घर ले जाने को मजबूर हुए परिजन

देहरादून। कोरोनकाल के दौर में उत्तराखंड में अस्पताल अब जीवन रक्षक नहीं, बल्कि लूट-खसोट का अड्डा बन गए हैं। पहले तो जनता कोरोना महामारी से  परेशान है, वहीं अस्पतालों में इलाज के नाम पर भारी भरकम खर्च से तिमारदारों के हलक सूख रहे हैं। सरकार की लचर स्वास्थ्य सिस्टम के चलते उत्तराखंड की जनता लूटने को लाचार और मजबूर है।

राजधानी देहरादून में एक ऐसे अस्पताल की करतूत हम आपको बताने जा रहे हैं, जो मानवता के नाम  पर कलंक है। चिकित्सकों ने पेशे को ही बदनाम नहीं किया है, बल्कि इंसानियत को भी शर्मशार किया है। जी हां, हम आपको बताते हैं कि किस तरह अस्पताल बीमारी के नाम पर मरीजों को लूट रहे है। वह भी तब जब सरकार कह रही है कि कोरोना का इलाज मुफ्त है। बावजूद इसके मरीजों से लाखों रुपये ऐंठ रहे हैं और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है।

बता दें कि हरिद्वार का एक मरीज तीन दिन से इलाज के लिए अस्पतालों में दर-दर भटकता रहा, लेकिन किसी ने इंसानियत नहीं दिखाई। रुड़की के एक अस्पताल ने एक मरीज को ब्लैक फंगस बीमारी के लक्षण बताए हैं। लेकिन अस्पताल में इलाज की सुविधा न होने की बात कहकर मरीज को चलता किया। उसके बाद रुड़की और हरिद्वार के बड़े अस्पतालों में इलाज के लिए परिजन मारे–मारे फिरते रहे। लेकिन कहीं इलाज नहीं मिला।

इसके बाद मरीज को उसके परिजन राजधानी देहरादून ले आये। यहां हरिद्वार रोड पर वह एक बड़े अस्पताल में ले गए, लेकिन उन्होंने भी इलाज करने से मना कर दिया। इसके बाद वह दून अस्पताल पहुंचे तो वहां भी गेट से ही उन्हें लौटा दिया गया।

इसके बाद दो-तीन प्राईवेट अस्पतालों में भटकने के बाद भी जब कहीं कोई इलाज नहीं मिला तो वह राजधानी में राजपुर रोड स्थित एक सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल के तमगे वाले अस्पताल में पहुंचे, तो वहां उनके साथ जो हुआ वह मानवता के नाम पर कलंक है।

अपने को सबसे बड़ा अस्पताल होने का दावा करने वाले इस हॉस्पिटल ने मरीज को भर्ती करने के बजाए इलाज पर 20 से 25 लाख खर्चे का एस्टीमेट बता दिया, यह सुनकर तीमारदारों के पैरों तले जमीन खिसक गई। इतने पैसे देने में वह असमर्थ थे और वह बगैर इलाज के उल्टे पांव घर लौटने को मजबूर हो गए।

हैरत की बात है कि जब मरीज उक्त सुपर स्पेशलिस्टी अस्पताल में था तो उसकी एक आंख ने पूरी तरह काम करना बंद कर दिया था। चेहरा सूजन से फूला हुआ था। नाक से खून बह रहा था। इतने गम्भीर रोगी का प्राथमिक उपचार करना भी बड़े तमगे वाले अस्पताल के चिकित्सकों ने मुनासिब नहीं समझा।

जबकि हाल ही में दून के चार अस्पतालों ने कोरोना के इलाज के लिए मरीजों से लाखों रुपये ऐंठे थे। शिकायत के बाद सरकार ने अस्पताल प्रबंधनो को रकम लौटने के आदेश दिए गए। इसके बाद भी लूट जारी है। राजधानी में ऐसे एक नहीं, लगभग सभी अस्पताल हैं, जो बीमारी के नाम पर लूट का धंधा चला रगे हैं।

इससे समझा जा सकता है कि ये नामी गिरामी अस्पताल समाज सेवा कर रहे हैं या समाज सेवा के नाम पर आम आदमी को लूट रहे हैं। आखिर ये लूट कब रुकेगी। अस्पतालों की मनमानी पर सरकार क्यों गम्भीर नहीं दिखाई दे रही है।

ये मनमानी राज्य सरकार की आम आदमी को सस्ते और सुलभ स्वास्थ्य के दावे पर सवाल खड़ा करती है। यदि सरकार को गरीब, असहायों की थोड़ा भी चिंता है तो तत्काल प्राईवेट अस्पतालों पर कड़ा शिकंजा कसना चाहिए। ताकि योगेश कुमार जैसे लोग मरीज का उपचार करा सकें।

ब्लैक फंगस को लेकर कोई जानकारी नहीं, लुटने को मजबूर लोग

कोरोना महामारी को नियंत्रित करने में उत्तराखंड सरकार फिलहाल विफल साबित हो रही है। अब एक और बीमारी पाँव पसारने लगी है। ब्लैक फंगस को लेकर सरकार ने अलर्ट जारी किया है। लेकिन ये करत सिर्फ कागजों में है। इस बीमारी के लक्षण मिलने पर मरीज को क्या ऐतिहात बर्तना चाहिए और किस अस्पताल में इलाज मिलेगा, ताकि मरीज को भटकना न पड़े। इलाज न मिलने पर मरीज कहां शिकायत करे, ऐसी भी कोई जानकारी अलर्ट में नही दिया गया है। ऐसे अलर्ट का क्या फायदा कि मरीज को कई दिन तक अस्पतालों में घुमाने के बाद भी इलाज न मिल सके। हेल्थ सिस्टम का हाल यह है कि महामारी के दौर में भी अधिकारी फोन तक उठाने को तैयार नही है, कार्रवाई तो दूर की बेस्ट है। इस सम्बन्ध में भी जब डीजी हेल्थ तृप्ति बहुगुणा से मोबाइल पर कई बार कॉल किया गया,  लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।

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ब्लैक फंगस का यह मामला संज्ञान में नहीं है। यह गम्भीर मामला है। इस तरह की शिकायत मुझे नहींं मिली है। लिखित शिकायत मिलने पर सम्बंधित अस्पताल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ब्लैक फंगस का इलाज इतना महंगा नहीं है। यह सामान्य बीमारी है, जो पहले भी होती थी। इसमें डरने जैसी कोई बात नहीं है। ब्लैक फंगस का इलाज सभी अस्पतालों में मिल सके, इस सम्बंध में अस्पतालों को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे हैं। अनूप डिमरी, सीएमओ, देहरादून”

17 thoughts on “उत्तराखंड में लूट के अड्डे बने अस्पताल, ब्लैक फंगस के एक मरीज से इलाज को मांगे 25 लाख

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